Thursday, 26 August 2010
भुज का प्रसिध्ध हमिर्सर तालाब
कच्छ में कई वर्षों के बाद बहुत ही अच्छी बारिश हुई है | भुज का प्रसिध्ध हमिर्सर तालाब पूरा पानी सें भरने के बाद बहुत ही आकर्षक द्रश्यमान हो रहा है |
VOICE OF RUSSIA 2010 COMPETITION
VOICE OF RUSSIA ORGANISED YEAR 2010 COMPETITION . FOR MORE DETAILS VISIT www.vour.hindi.ru
CRC MIRZAPAR SCIENCE FAIR
CRC MIRZAPAR ORGANISED SCIENCE FAIR ON 11TH AUGUST 2010 AT MOCHIRAI PRIMARY SCHOOL. 10 SCHOOL PARTICIPETED AND PRESENT 18 SCIENCE PROJECT.
Tuesday, 27 July 2010
Commonwealth Games 2010 Delhi
http://www.cwgdelhi2010.org/
Wednesday, 21 July 2010
अपना अंतरिक्ष केंद्र बनाएगा रूस
रूस के प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि रूस सैटलाइट लॉन्च करने के लिए एक नया कॉस्मोड्रोम बनाने जा रहा है. इसके लिए 80 करोड़ डॉलर दिए जाएंगे.
रूस अब तक अपने सैटलाइट कजाख़स्तान में स्थित लॉन्च साइट से भेजता है. कजाख़स्तान में यह लॉन्च साइट सोवियत संघ के वक्त में बनाई गई थी. लेकिन अब रूस चाहता है कि कजाख़स्तान पर उसकी निर्भरता कम हो. पुतिन ने कहा कि सरकार ने एक नया कॉस्मोड्रोम बनाने के लिए 80 करोड़ डॉलर देने का फैसला किया है. यह धन अगले तीन साल के दौरान दिया जाएगा.Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: तीन साल में 80 करोड़ डॉलर
नया स्पेसपोर्ट सुदूर पूर्वी क्षेत्र उगलेगोर्स्क में बनाया जाएगा. यह 2015 तक बनकर तैयार होगा. रूसी प्रधानमंत्री पुतिन ने सैटलाइट बनाने वाली देश की प्रमुख कंपनी एनर्जिया रॉकेट एंड स्पेस कॉर्पोरेशन में कहा, “मुझे पूरी उम्मीद है कि वोस्टोकनी देश का पहला कॉस्मोड्रोम होगा जो नागरिक कार्यों में इस्तेमाल होगा और इससे रूस अपनी अंतरिक्ष की गतिविधियों के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा.“
उन्होंने कहा कि यह बहुत जरूरी है कि कॉस्मोड्रोम हमारे सभी अंतरिक्ष कार्यक्रमों को असरदार तरीके से चला सके. उन्होंने बताया कि रूस कुल मिलाकर 320 करोड़ डॉलर से ज्यादा धन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर खर्च करने जा रहा है. इसमें ग्लोनास सिस्टम का विकास कार्यक्रम भी शामिल है. ग्लोनास अमेरिका के ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम के जवाब में तैयार किया जा रहा है.Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: यूरी गागारिन थे पहले अंतरिक्ष यात्री
इसके अलावा पुतिन ने अपने देश के अंतरिक्ष बाजार को दुनिया की पहुंच में लाने की भी बात की. उन्होंने बताया कि नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी, जापान एरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी और बोइंग जैसी संस्थाओं और कंपनियों के वैज्ञानिकों को रूसी कंपनी एनर्जिया रॉकेट मेकर तक पहुंच देने के आदेश दे दिए गए हैं. रूसी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ये लोग अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के लिए काम करेंगे.
पुतिन ने बताया कि ऐसा ही फैसला यूक्रेन के वैज्ञानिकों के लिए भी लिया गया है. वे लोग सोयूज और प्रोग्रेस जैसे अंतरिक्ष यानों को जोड़ने और टेस्ट करने का काम करेंगे.
रूस अब तक अपने सैटलाइट कजाख़स्तान में स्थित लॉन्च साइट से भेजता है. कजाख़स्तान में यह लॉन्च साइट सोवियत संघ के वक्त में बनाई गई थी. लेकिन अब रूस चाहता है कि कजाख़स्तान पर उसकी निर्भरता कम हो. पुतिन ने कहा कि सरकार ने एक नया कॉस्मोड्रोम बनाने के लिए 80 करोड़ डॉलर देने का फैसला किया है. यह धन अगले तीन साल के दौरान दिया जाएगा.Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: तीन साल में 80 करोड़ डॉलर
नया स्पेसपोर्ट सुदूर पूर्वी क्षेत्र उगलेगोर्स्क में बनाया जाएगा. यह 2015 तक बनकर तैयार होगा. रूसी प्रधानमंत्री पुतिन ने सैटलाइट बनाने वाली देश की प्रमुख कंपनी एनर्जिया रॉकेट एंड स्पेस कॉर्पोरेशन में कहा, “मुझे पूरी उम्मीद है कि वोस्टोकनी देश का पहला कॉस्मोड्रोम होगा जो नागरिक कार्यों में इस्तेमाल होगा और इससे रूस अपनी अंतरिक्ष की गतिविधियों के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा.“
उन्होंने कहा कि यह बहुत जरूरी है कि कॉस्मोड्रोम हमारे सभी अंतरिक्ष कार्यक्रमों को असरदार तरीके से चला सके. उन्होंने बताया कि रूस कुल मिलाकर 320 करोड़ डॉलर से ज्यादा धन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर खर्च करने जा रहा है. इसमें ग्लोनास सिस्टम का विकास कार्यक्रम भी शामिल है. ग्लोनास अमेरिका के ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम के जवाब में तैयार किया जा रहा है.Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: यूरी गागारिन थे पहले अंतरिक्ष यात्री
इसके अलावा पुतिन ने अपने देश के अंतरिक्ष बाजार को दुनिया की पहुंच में लाने की भी बात की. उन्होंने बताया कि नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी, जापान एरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी और बोइंग जैसी संस्थाओं और कंपनियों के वैज्ञानिकों को रूसी कंपनी एनर्जिया रॉकेट मेकर तक पहुंच देने के आदेश दे दिए गए हैं. रूसी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ये लोग अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के लिए काम करेंगे.
पुतिन ने बताया कि ऐसा ही फैसला यूक्रेन के वैज्ञानिकों के लिए भी लिया गया है. वे लोग सोयूज और प्रोग्रेस जैसे अंतरिक्ष यानों को जोड़ने और टेस्ट करने का काम करेंगे.
रूस का अंतरिक्ष कार्यक्रम हाल के बरसों में कुछ कमजोर पड़ा है, जबकि उसका इतिहास उपलब्धियों से भरा पड़ा है. रूस ने 1961 में सबसे पहले अंतरिक्ष में इंसान को भेजने का कारनामा किया था. इसके चार साल बाद ही उसने स्पूतनिक को अंतरिक्ष में भेजकर इतिहास रच दिया था. यह उपलब्धि आज भी रूसी लोगों के लिए गर्व का विषय है.
ई-बुक्स की बिक्री ने हार्ड कवर किताबों को पीछे छोड़ा
डिजिटल किताबें अब हार्ड कवर वाली किताबों से ज्यादा बिक रही हैं. अमेजन डॉट कॉम का दावा है कि तीन महीनों में हार्ड कवर वाली किताबों की तुलना में ई-बुक्स की बिक्री ज्यादा हुई है. किंडल डिवाइस के दाम घटे तो बढ़ी बिक्री.
इस साल अप्रैल से जून के बीच अमेजन डॉट कॉम ने हार्ड कवर वाली किताबों की तुलना में 43 फीसदी ज्यादा डिजिटल किताबें बेचने का दावा किया है. इन डिजिटल किताबों को ई-बुक्स कहा जाता है. अमेजन का दावा है कि हार्ड कवर वाली किताब पढ़ने के बजाए लोग अब किंडल डिवाइस के सहारे डिजिटल किताबें ज्यादा पढ़ रहे हैं. और इसलिए ज्यादा ई-बुक्स बिक रही हैं. Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:
किंडल एक ऐसा सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर प्लेटफॉर्म है जिसकी डिस्पले स्क्रीन पर लोग किताबें पढ़ सकते हैं. तीन साल पहले किताब पढ़ने के लिए किंडल डिवाइस को ईजाद किया गया जिसकी डिस्पले स्क्रीन पर आराम से किताब पढ़ी जा सकती है. यानी कुर्सी पर बैठे या बिस्तरों में दुबके लोगों के हाथ किताब की जगह किंडल डिवाइस ने ले ली और पन्नों को उलटने के बजाए उसे स्क्रॉल करना जरूरी हो गया. अमेजन की मानें तो किंडल का उसे फायदा भी हुआ है और उसकी बिक्री बढ़ी है.
सिर्फ जून महीने में डिजिटल किताबें हार्डबैक कवर वाली किताबों की तुलना में 80 फीसदी ज्यादा बिकीं. हालांकि कंपनी ने अभी तक बिक्री का पूरा विवरण देने के लिए सेल्स डाटा नहीं दिया है. माना जा रहा है कि किंडल डिवाइस की कीमतों में आई गिरावट भी डिजिटल किताबों के ज्यादा बिकने की वजह हो सकती है. अमेजन डॉट कॉम की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में वेबसाइट के संस्थापक और चीफ एक्जीक्यूटिव जैफ बेजोस ने बताया, "किंडल डिवाइस की बिक्री तीन गुना बढ़ी है. पहले इसकी कीमत 259 डॉलर रखी गई लेकिन अब यह 189 डॉलर में बिक रहा है."
किंडल किताबों को एप्पल के आईफोन, आईपैड और लैपटॉप पर भी पढ़ा जा सकता है. अमेजन वेबसाइट पर 630,000 ई-बुक्स उपलब्ध हैं जिनमें पांच लाख से ज्यादा किताबों की कीमत 10 डॉलर से कम है. अमेजन की हार्डबैक कवर वाली किताबों की कीमत नहीं बताई गई है. अमेजन की ओर जारी आंकड़ों में पेपरबैक किताबों की बिक्री शामिल नहीं की गई है. पेपरबैक किताबों से ही किताबों के बाजार में दो तिहाई पैसा आता है और ऐसा लगता है कि पेपरबैक को पीछे छोड़ने के लिए किंडल को अभी लंबा सफर तय करना है.
इस साल अप्रैल से जून के बीच अमेजन डॉट कॉम ने हार्ड कवर वाली किताबों की तुलना में 43 फीसदी ज्यादा डिजिटल किताबें बेचने का दावा किया है. इन डिजिटल किताबों को ई-बुक्स कहा जाता है. अमेजन का दावा है कि हार्ड कवर वाली किताब पढ़ने के बजाए लोग अब किंडल डिवाइस के सहारे डिजिटल किताबें ज्यादा पढ़ रहे हैं. और इसलिए ज्यादा ई-बुक्स बिक रही हैं. Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:
किंडल एक ऐसा सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर प्लेटफॉर्म है जिसकी डिस्पले स्क्रीन पर लोग किताबें पढ़ सकते हैं. तीन साल पहले किताब पढ़ने के लिए किंडल डिवाइस को ईजाद किया गया जिसकी डिस्पले स्क्रीन पर आराम से किताब पढ़ी जा सकती है. यानी कुर्सी पर बैठे या बिस्तरों में दुबके लोगों के हाथ किताब की जगह किंडल डिवाइस ने ले ली और पन्नों को उलटने के बजाए उसे स्क्रॉल करना जरूरी हो गया. अमेजन की मानें तो किंडल का उसे फायदा भी हुआ है और उसकी बिक्री बढ़ी है.
सिर्फ जून महीने में डिजिटल किताबें हार्डबैक कवर वाली किताबों की तुलना में 80 फीसदी ज्यादा बिकीं. हालांकि कंपनी ने अभी तक बिक्री का पूरा विवरण देने के लिए सेल्स डाटा नहीं दिया है. माना जा रहा है कि किंडल डिवाइस की कीमतों में आई गिरावट भी डिजिटल किताबों के ज्यादा बिकने की वजह हो सकती है. अमेजन डॉट कॉम की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में वेबसाइट के संस्थापक और चीफ एक्जीक्यूटिव जैफ बेजोस ने बताया, "किंडल डिवाइस की बिक्री तीन गुना बढ़ी है. पहले इसकी कीमत 259 डॉलर रखी गई लेकिन अब यह 189 डॉलर में बिक रहा है."
किंडल किताबों को एप्पल के आईफोन, आईपैड और लैपटॉप पर भी पढ़ा जा सकता है. अमेजन वेबसाइट पर 630,000 ई-बुक्स उपलब्ध हैं जिनमें पांच लाख से ज्यादा किताबों की कीमत 10 डॉलर से कम है. अमेजन की हार्डबैक कवर वाली किताबों की कीमत नहीं बताई गई है. अमेजन की ओर जारी आंकड़ों में पेपरबैक किताबों की बिक्री शामिल नहीं की गई है. पेपरबैक किताबों से ही किताबों के बाजार में दो तिहाई पैसा आता है और ऐसा लगता है कि पेपरबैक को पीछे छोड़ने के लिए किंडल को अभी लंबा सफर तय करना है.
Friday, 16 July 2010
कम्प्यूटर की खोज
कम्प्यूटर की खोज : थोमास एडिसन ने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया, विलबर और ऑरविल राइट ने पहली बार हवाई जहाज़ से उड़ने का प्रयोग किया, लेकिन कंप्यूटर कहां से आया? किसने पहला कंप्यूटर बनाया?
वैसे तो ऐबेकस के रूप में सदियों से कैलकुलेटर जैसा एक औजार था, लेकिन डाटा स्टोरिंग की मशीन किसने बनाई? पेटेंट दफ़्तर में इस सिलसिले में चार्ल्स बैबेज का नाम दर्ज है. वे इंगलैंड के थे और उन्नीसवीं सदी में ही उन्होंने इसके शुरुआती सिद्धांत बनाए थे. लेकिन जर्मनी के कॉनराड त्सूज़े ने पहली बार 1941 में एक मशीन तैयार की, जिसे आजके कंप्यूटर का जनक कहा जा सकता है. इसमें बस 64 शब्द स्टोर किए जा सकते थे. त्सूज़े इतना ही चाहते थे कि उन्हें किसी तरह हिसाब के झमेले से निजात मिल जाए. 1992 में इस सिलसिले में उन्होंने कहा था -
मैंने सिविल इंजिनीयरिंग की पढ़ाई की थी. सिविल इंजिनीयर को हिसाब लगाने होते हैं, जिनमें काफ़ी माथापच्ची करनी पड़ती है. मैं चाहता था कि ये हिसाब ऑटोमेटिक ढंग से हों, फिर मुझे एक तरीका सूझा और यह मशीन बनी, जिसे हम आज कंप्यूटर कहते हैं. आप कह सकते हैं कि मेरे पेशे की मजबूरी से इसका जन्म हुआ. - कॉनराड त्सूज़े
1938 में त्सूज़े ने ज़ेड 1 Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: त्सूज़े का मॉडल ज़ेड 1नाम की जो मशीन तैयार की, उसमें चारों ओर छड़ों और हैंडिलों की भरमार ती. यह प्रयोग के लिए एक मॉडल था, और इसमें अभी बहुत सी ख़ामियां थीं. इसके बाद उन्होंने ज़ेड 2 नाम का एक और मॉडल तैयार किया, जिसमें एक टेलिफ़ोन रीले सिस्टेम था. फिर 1941 में तैयार हुआ दुनिया का पहला कामकाजी कंप्यूटर ज़ेड 3 यह देखने में एक विशाल अलमारी जैसा था और इसमें 600 टेलिफ़ोन रीले सिस्टेम शामिल थे. आज इस मशीन को म्युनिख के जर्मन संग्रहालय में रखा गया है. हाइंत्ज़ मोएलर यहां दर्शकों को ज़ेड 3 की बारीकियों का परिचय देते हैं और उनके सवालों का जवाब देते हैं. वे कहते हैं -
लोग इस मशीन के सामने खड़े रहते हैं और हैरत से इसे देखते रहते हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि यह क्या है. काफ़ी दिलचस्प सवाल भी पूछे जाते हैं. अभी पिछले हफ़्ते एक कंप्यूटर प्रेमी ने मुझसे पूछा कि क्या इसे इंटरनेट से जोड़ा जा सकता है? मैंने उनसे कहा, क्यों नहीं, अगर आपके पास बूट करने के लिए 28 हज़ार साल का वक्त हो. - हाइंत्ज़ मोएलर
कॉनराड त्सूज़े ने सिर्फ़ वही नहीं तैयार किया, जिसे आज की भाषा में हार्डवेयर कहते हैं. उन्हें एक प्रोग्राम, यानी सॉफ़्टवेयर भी तैयार करना पड़ा, ताकि कंप्यूटर काम कर सके. उनकी भाषा में हिसाब की प्रणाली. इसमें पंच सिस्टेम के ज़रिये निर्देश व संख्याएं दी गई थीं, जिनके आधार पर यह मशीन काम करती थी.
यह नाज़ियों का ज़माना था, द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था. हालांकि त्सूज़े ने नाज़ी सरकार के निर्देश पर इसे तैयार नहीं किया था, लेकिन युद्ध में इस्तेमाल के लिए उन्होंने अपना आविष्कार मुहैया कराया था. नए विमान तैयार करने के लिए या दूसरे पक्ष की सूचनाओं को डिकोड करने के लिए इसे काम में लाया जा रहा था. त्सूज़े सिर्फ़ अपने आविष्कार में मगन थे. पीछे मुड़कर देखते हुए बाद में उन्होंने कहा था -
उस समय मेरे सामने सवाल यह था कि कैसे इस तरह की मशीनों को विकसित करते हुए विश्लेषण का काम आगे बढ़ाया जा सकता है. सेना के लोगों से भी मेरी बाते हुई थीं, लेकिन उनके पास एनिग्मा नाम की मशीन थी, जो उस दौर के हिसाब से काफ़ी अच्छी थी. - कॉनराड त्सूज़े
विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद जर्मनी को कंप्यूटर नही, दूसरी चीज़ों की ज़रूरत थी. लेकिन कॉनराड त्सूज़े अपने रास्ते पर बने रहे.
मेरे लिए यह बात साफ़ थी कि मैं संगणन की एक नई दुनिया में क़दम रख रहा हूं और मेरी राय में ऐलगोरिदम की भाषा तैयार करने के लिए शतरंज का खेल एक इलाका हो सकता था. मिसाल के तौर पर 1938 में अपने दोस्तों के बीच मज़ाक करते हुए मैंने कहा था कि पचास साल के अंदर एक मशीन शतरंज के विश्वचैंपियन को हरा देगी. अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन रास्ता बिल्कुल सही था - कॉनराड त्सूज़े
1940 से ही कॉनराड त्सूज़े की अपनी कंपनी थी, त्सूज़े अप्पाराटेनबाऊ, जो 1964 में दीवालिया हो गई. लेकिन इससे भी ज़्यादा अफ़सोस उन्हें इस बात का था, कि पेटेंट दफ़्तर में उनकी दरख़्वास्त खारिज कर दी गई. उनका कहना था कि यह फ़ैसला सही नहीं था.
कंपनी दीवालिया हो जाने के बाद वे कलाकार बन गए. लेकिन यहां भी कंप्यूटर ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. वे कंप्यूटर की दुनिया के दिग्गजों की ऑयल पेंटिंग बनाने लगे. 1995 में अपनी मौत से कुछ ही माह पहले उन्होंने बिल गेट्स को उनकी एक तस्वीर भेंट की. सीएट्ल में माइक्रोसॉफ़्ट के मुख्यालय में बिल गेट्स के दफ़्तर में आज भी यह तस्वीर टंगी हुई है.
सौजन्य : रेडियो दोइत्श्चे वेले -जर्मनी
वैसे तो ऐबेकस के रूप में सदियों से कैलकुलेटर जैसा एक औजार था, लेकिन डाटा स्टोरिंग की मशीन किसने बनाई? पेटेंट दफ़्तर में इस सिलसिले में चार्ल्स बैबेज का नाम दर्ज है. वे इंगलैंड के थे और उन्नीसवीं सदी में ही उन्होंने इसके शुरुआती सिद्धांत बनाए थे. लेकिन जर्मनी के कॉनराड त्सूज़े ने पहली बार 1941 में एक मशीन तैयार की, जिसे आजके कंप्यूटर का जनक कहा जा सकता है. इसमें बस 64 शब्द स्टोर किए जा सकते थे. त्सूज़े इतना ही चाहते थे कि उन्हें किसी तरह हिसाब के झमेले से निजात मिल जाए. 1992 में इस सिलसिले में उन्होंने कहा था -
मैंने सिविल इंजिनीयरिंग की पढ़ाई की थी. सिविल इंजिनीयर को हिसाब लगाने होते हैं, जिनमें काफ़ी माथापच्ची करनी पड़ती है. मैं चाहता था कि ये हिसाब ऑटोमेटिक ढंग से हों, फिर मुझे एक तरीका सूझा और यह मशीन बनी, जिसे हम आज कंप्यूटर कहते हैं. आप कह सकते हैं कि मेरे पेशे की मजबूरी से इसका जन्म हुआ. - कॉनराड त्सूज़े
1938 में त्सूज़े ने ज़ेड 1 Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: त्सूज़े का मॉडल ज़ेड 1नाम की जो मशीन तैयार की, उसमें चारों ओर छड़ों और हैंडिलों की भरमार ती. यह प्रयोग के लिए एक मॉडल था, और इसमें अभी बहुत सी ख़ामियां थीं. इसके बाद उन्होंने ज़ेड 2 नाम का एक और मॉडल तैयार किया, जिसमें एक टेलिफ़ोन रीले सिस्टेम था. फिर 1941 में तैयार हुआ दुनिया का पहला कामकाजी कंप्यूटर ज़ेड 3 यह देखने में एक विशाल अलमारी जैसा था और इसमें 600 टेलिफ़ोन रीले सिस्टेम शामिल थे. आज इस मशीन को म्युनिख के जर्मन संग्रहालय में रखा गया है. हाइंत्ज़ मोएलर यहां दर्शकों को ज़ेड 3 की बारीकियों का परिचय देते हैं और उनके सवालों का जवाब देते हैं. वे कहते हैं -
लोग इस मशीन के सामने खड़े रहते हैं और हैरत से इसे देखते रहते हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि यह क्या है. काफ़ी दिलचस्प सवाल भी पूछे जाते हैं. अभी पिछले हफ़्ते एक कंप्यूटर प्रेमी ने मुझसे पूछा कि क्या इसे इंटरनेट से जोड़ा जा सकता है? मैंने उनसे कहा, क्यों नहीं, अगर आपके पास बूट करने के लिए 28 हज़ार साल का वक्त हो. - हाइंत्ज़ मोएलर
कॉनराड त्सूज़े ने सिर्फ़ वही नहीं तैयार किया, जिसे आज की भाषा में हार्डवेयर कहते हैं. उन्हें एक प्रोग्राम, यानी सॉफ़्टवेयर भी तैयार करना पड़ा, ताकि कंप्यूटर काम कर सके. उनकी भाषा में हिसाब की प्रणाली. इसमें पंच सिस्टेम के ज़रिये निर्देश व संख्याएं दी गई थीं, जिनके आधार पर यह मशीन काम करती थी.
यह नाज़ियों का ज़माना था, द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था. हालांकि त्सूज़े ने नाज़ी सरकार के निर्देश पर इसे तैयार नहीं किया था, लेकिन युद्ध में इस्तेमाल के लिए उन्होंने अपना आविष्कार मुहैया कराया था. नए विमान तैयार करने के लिए या दूसरे पक्ष की सूचनाओं को डिकोड करने के लिए इसे काम में लाया जा रहा था. त्सूज़े सिर्फ़ अपने आविष्कार में मगन थे. पीछे मुड़कर देखते हुए बाद में उन्होंने कहा था -
उस समय मेरे सामने सवाल यह था कि कैसे इस तरह की मशीनों को विकसित करते हुए विश्लेषण का काम आगे बढ़ाया जा सकता है. सेना के लोगों से भी मेरी बाते हुई थीं, लेकिन उनके पास एनिग्मा नाम की मशीन थी, जो उस दौर के हिसाब से काफ़ी अच्छी थी. - कॉनराड त्सूज़े
विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद जर्मनी को कंप्यूटर नही, दूसरी चीज़ों की ज़रूरत थी. लेकिन कॉनराड त्सूज़े अपने रास्ते पर बने रहे.
मेरे लिए यह बात साफ़ थी कि मैं संगणन की एक नई दुनिया में क़दम रख रहा हूं और मेरी राय में ऐलगोरिदम की भाषा तैयार करने के लिए शतरंज का खेल एक इलाका हो सकता था. मिसाल के तौर पर 1938 में अपने दोस्तों के बीच मज़ाक करते हुए मैंने कहा था कि पचास साल के अंदर एक मशीन शतरंज के विश्वचैंपियन को हरा देगी. अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन रास्ता बिल्कुल सही था - कॉनराड त्सूज़े
1940 से ही कॉनराड त्सूज़े की अपनी कंपनी थी, त्सूज़े अप्पाराटेनबाऊ, जो 1964 में दीवालिया हो गई. लेकिन इससे भी ज़्यादा अफ़सोस उन्हें इस बात का था, कि पेटेंट दफ़्तर में उनकी दरख़्वास्त खारिज कर दी गई. उनका कहना था कि यह फ़ैसला सही नहीं था.
कंपनी दीवालिया हो जाने के बाद वे कलाकार बन गए. लेकिन यहां भी कंप्यूटर ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. वे कंप्यूटर की दुनिया के दिग्गजों की ऑयल पेंटिंग बनाने लगे. 1995 में अपनी मौत से कुछ ही माह पहले उन्होंने बिल गेट्स को उनकी एक तस्वीर भेंट की. सीएट्ल में माइक्रोसॉफ़्ट के मुख्यालय में बिल गेट्स के दफ़्तर में आज भी यह तस्वीर टंगी हुई है.
सौजन्य : रेडियो दोइत्श्चे वेले -जर्मनी
Thursday, 15 July 2010
રમતા રમતા ભણીયે કાર્યક્રમ
રમતા રમતા ભણીયે કાર્યક્રમ ધોરણ 1-2-3 મા જુલાઇ -ઑગષ્ટ 2010 માં 40 દીવ્સ ચલાવવા નો ચ્હે . આ કાર્યક્રમ માં પ્રવૃતિ દ્વારા જ્ઞાન મુજબ બાળકોને શિક્ષણ આપવાનું અભિગમ ચે.
प्रज्ञा (प्रवृति के साथ ज्ञान ) प्राथमिक शिक्षा में एक अभिनव कार्यक्रम
प्रज्ञा (प्रवृति के साथ ज्ञान ) प्राथमिक शिक्षा में एक अभिनव कार्यक्रम है
इस कार्यक्रम के अंतर्गत कक्षा १-२ के विद्यार्थिओं को दो अलग - अलग क्लासरूम (गुजराती - पर्यावरण ) और (गणित - रएँबो) में एक साथ एक्टिविटी के विद्यार्थी की क्षमता मुताबिक बच्चे अपने आप पढ़ते हैं
लेदर्स के माध्यम सें कार्ड पसंद करके उस कार्ड के हिसाब सें एक्टिविटी के द्वारा शिक्षा प्राप्त करते हैं
कार्ड के सूचित चित्र के अनुसार छ प्रकारके ग्रुप हैं
बच्चे कार्ड के चित्र
को लेकर शिक्षक के पास जाता है
शिक्षक इस प्रमाण सें उसे एक्टिविटी करता है
जिस तरह बच्चे लेदर के एक एक कार्ड के मुताबिक एक्टिविटी कर लेता है तो लेदर के पास जा कर अगले कार्ड को पसंद करता है
इस तरह एक एक माइलस्टोन पार करके प्रगति करता रहता है
इस कार्यक्रम की सबसें बड़ी विशेषता यह है की बच्चों को स्कुल बेग का भर उठाने सें मुक्ति मिलती है
इस कार्यक्रम के अंतर्गत कक्षा १-२ के विद्यार्थिओं को दो अलग - अलग क्लासरूम (गुजराती - पर्यावरण ) और (गणित - रएँबो) में एक साथ एक्टिविटी के विद्यार्थी की क्षमता मुताबिक बच्चे अपने आप पढ़ते हैं
लेदर्स के माध्यम सें कार्ड पसंद करके उस कार्ड के हिसाब सें एक्टिविटी के द्वारा शिक्षा प्राप्त करते हैं
कार्ड के सूचित चित्र के अनुसार छ प्रकारके ग्रुप हैं
बच्चे कार्ड के चित्र
को लेकर शिक्षक के पास जाता है
शिक्षक इस प्रमाण सें उसे एक्टिविटी करता है
जिस तरह बच्चे लेदर के एक एक कार्ड के मुताबिक एक्टिविटी कर लेता है तो लेदर के पास जा कर अगले कार्ड को पसंद करता है
इस तरह एक एक माइलस्टोन पार करके प्रगति करता रहता है
इस कार्यक्रम की सबसें बड़ी विशेषता यह है की बच्चों को स्कुल बेग का भर उठाने सें मुक्ति मिलती है
TEACHER'S TRAINING IN JULY 2010
TEACHER'S TRAINING IN JULY 2010
STD: 1-2-3-4 TEACHERS ON 2nd JULY 2010
STD: 5-6-7 TEACHERS ON 16th JULY 2010
STD: 1-2-3-4 TEACHERS ON 2nd JULY 2010
STD: 5-6-7 TEACHERS ON 16th JULY 2010
प्रज्ञा (प्रवृति द्वारा ज्ञान ) ABL (एक्टिविटी बैज लर्निंग ) कार्यक्रम
मिर्ज़ापर सी. आर. सी. की ३ स्कूलों की प्रज्ञा (प्रवृति द्वारा ज्ञान ) ABL (एक्टिविटी बैज लर्निंग ) कार्यक्रम के लिए पसंद की गयी है
(१) मिर्जापर कन्या शाला
(२) सुखपर कन्या शाला -१
(३) सुखपर कन्या शाला -२
दिनांक ७-10 जुलाई २०१० को इस कार्यक्रम के अंतर्गत इन स्कूलों के कक्षा १-२ के शिक्षकों को मेहसाना जिल्ला के विजापुर तहेसिल की स्कूलों की एक्सपोज़र विजीट की गयी और आगलोड़ में प्रशिक्षण दिया गया
इस प्रशिक्षण में सी.आर.सी. को-ऑर्डिनेटर नानजी जनजानी के आलावा निम्नी दर्शित शिक्षकों ने भाग लिया
(१) श्री किर्तिभाई सोनी प्रमुख अध्यापक सुखपर कन्या शाला -२
(2) श्री जयेशभाई सोलंकी अध्यापक सुखपर कन्या शाला -२
(3) श्रीमती गीताबेन त्रावादी प्रमुख अध्यापक मिर्जापर कन्या शाला
(4) श्रीमती रीताबेन कनासागारा अध्यापक मिर्जापर कन्या शाला
(5) शिल्पाबेन जेठी अध्यापक मिर्जापर कन्या शाला
(६) श्री किशोरभाई डाभी प्रमुख अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(7) श्रीमती चेतनाबेन ठक्कर अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(8) श्रीमती प्रतिमाबेन सोनी अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(9) श्रीमती अन्जुमबेंन खत्री अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(१) मिर्जापर कन्या शाला
(२) सुखपर कन्या शाला -१
(३) सुखपर कन्या शाला -२
दिनांक ७-10 जुलाई २०१० को इस कार्यक्रम के अंतर्गत इन स्कूलों के कक्षा १-२ के शिक्षकों को मेहसाना जिल्ला के विजापुर तहेसिल की स्कूलों की एक्सपोज़र विजीट की गयी और आगलोड़ में प्रशिक्षण दिया गया
इस प्रशिक्षण में सी.आर.सी. को-ऑर्डिनेटर नानजी जनजानी के आलावा निम्नी दर्शित शिक्षकों ने भाग लिया
(१) श्री किर्तिभाई सोनी प्रमुख अध्यापक सुखपर कन्या शाला -२
(2) श्री जयेशभाई सोलंकी अध्यापक सुखपर कन्या शाला -२
(3) श्रीमती गीताबेन त्रावादी प्रमुख अध्यापक मिर्जापर कन्या शाला
(4) श्रीमती रीताबेन कनासागारा अध्यापक मिर्जापर कन्या शाला
(5) शिल्पाबेन जेठी अध्यापक मिर्जापर कन्या शाला
(६) श्री किशोरभाई डाभी प्रमुख अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(7) श्रीमती चेतनाबेन ठक्कर अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(8) श्रीमती प्रतिमाबेन सोनी अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
(9) श्रीमती अन्जुमबेंन खत्री अध्यापक सुखपर कन्या शाला -१
Friday, 4 June 2010
सांगहाई विश्व मेलेका आयोजन
चाइना रेडियो इंटरनेशनल ने दुनिया के सामने चीन की च्छाबी को बहुत ही अच्छी तरहा सेन प्रस्तुत किया है
बेइजिंग ओलंपिक के बाद 2010 सांगहाई विश्व मेले को सी.आर.आई. ने हर एक देश के पंडाल(मंडप) को बहुत ही न्यायपूर्ण तरीके से बताया है
हर रोज के समाचारों में सांगहाई विश्व मेले को विस्तृत रूप से बताया जाता है
इस सें चीन की ताकत का अंदाज़ा निकलता है
वास्त्व में चीन सदा ही शांति पूर्ण देश है
पहले और दुसरे विश्व युध्ध में चीन ने किसी पर अपना प्रादबाव बनाया एसा बहुत ही कम जानने को मिलता है
इस लिए आज के चीन की विकास की गति तेज और सोहरद्रूप है
पूरे विश्वने चीन को जाना है, माना है और पहचाना है
सांगहाई विश्व मेलेका आयोजन करके चीनने पूरे एसिया को गौरव प्रदान किया है
बेइजिंग ओलंपिक के बाद 2010 सांगहाई विश्व मेले को सी.आर.आई. ने हर एक देश के पंडाल(मंडप) को बहुत ही न्यायपूर्ण तरीके से बताया है
हर रोज के समाचारों में सांगहाई विश्व मेले को विस्तृत रूप से बताया जाता है
इस सें चीन की ताकत का अंदाज़ा निकलता है
वास्त्व में चीन सदा ही शांति पूर्ण देश है
पहले और दुसरे विश्व युध्ध में चीन ने किसी पर अपना प्रादबाव बनाया एसा बहुत ही कम जानने को मिलता है
इस लिए आज के चीन की विकास की गति तेज और सोहरद्रूप है
पूरे विश्वने चीन को जाना है, माना है और पहचाना है
सांगहाई विश्व मेलेका आयोजन करके चीनने पूरे एसिया को गौरव प्रदान किया है
Sunday, 30 May 2010
Radio Listening Activity Exhibition by Nanji Janjani
Global Kutch hobby Corner and Kutch Philatelic Association organised Exihibition on 7-8-9 May 2010 KACEA EXPO 10 at Jubilee Groung in Bhuj. Mr. Nanji Janjani participate in this exihibition and present Radio Listening Activity document, Competition letter and guidebook.
Exihibition of radio listening activity
Global Kutch hobby Corner and Kutch Philatelic Association organised 3 Day Exihibition on 23-24-25 April 2010 at Madanshinhji Library in Bhuj. Mr. Nanji Janjani has participate in this exihibition and present Radio Listening Activity document, Competion and guidebook.
Thursday, 13 May 2010
रूस में 7 मई को रेडियो दिवस मनाया जाता है।
जैसाकि हम जानते हैं - रेडियो का आविष्कार 19वीं शताब्दी के अन्त में हुआ था। 7 मई 1895 को प्रतिभाशाली रूसी वैज्ञानिक अलेक्सांदर पपोव ने पिटर्सबर्ग में रूसी भौतिकी-गणित समाज की बैठक में पहली बार अपने इस अनूठे आविष्कार को यानी दुनिया के पहले रेडियो को प्रस्तुत किया था। वे बेहद खुश थे कि वे 600 मीटर की दूरी पर अपनी आवाज़ का प्रसारण कर सकते हैं। 7 मई का वह दिन फिर इतिहास का एक पन्ना हो गया। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में रेडियो को एक अजूबा ही माना जाता था। फिर 1924 में रूस में नियमित रूप से रेडियो प्रसारण शुरू हो गया। फिर द्वितीय विश्व युद्द में हुई रूस की विजय के वर्ष में एक नया दिवस - रेडियो दिवस मनाया जाने लगा। तब से लेकर आज तक कई बार ऐसे मौके भी आए हैं, जब रेडियो का तिरस्कार किया गया। जब टेलीविजन प्रसारण शुरू हुआ तो लोगों ने समझा कि अब रेडियो प्रसारण बन्द हो जाएँगे। फिर जब इन्टरनेट सामने आया तो फिर से यह भविष्यवाणी की गई कि अब रेडियो प्रसारणों के दिन लद चुके हैं। लेकिन रेडियो ने दुनिया में अपनी जगह बनाए रखी और आज भी वह एक सबसे लोकतांत्रिक और सबसे प्रभावशाली तथा कारगर समाचार साधन है। वास्तव में आज रेडियो के बिना जीवन की कल्पना करना भी कठिन है। भला कौन आज ख़बरें या संगीत सुने बिना रह सकता है। तमाम तरह की छोटी बड़ी जानकारियाँ हमें तुरन्त रेडियो से मिल जाती हैं। आज रूस में करीब दो हज़ार छोटे-बड़े रेडियो प्रसारण किए जाते हैं। सिर्फ़ मास्को में ही पचास से ज़्यादा रेडियो स्टेशन काम कर रहे हैं। रेडियो रूस के अध्यक्ष आन्द्रेय बिस्त्रीत्स्की ने बताया कि विदेशी भाषाओं में विदेशी श्रोताओं के लिए रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में बड़ी कड़ी प्रतियोगिता होने के बावजूद रेडियो रूस ने श्रोताओं के बीच अपनी भरी-पूरी जगह बना रखी है और रेडियो रूस के श्रोताओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
Tuesday, 4 May 2010
रेडियो तेहरान
प्रातःकालीन UTC समयानुसार शोर्ट वेव
०२:30 - 3:00 M KHZ
२२ १३७५०
२५ ११७१०
सायंकालीन UTC समयानुसार शोर्ट वेव
१४:30 - 15:30 M KHZ
२५ ११९५५
२२ १३७००
०२:30 - 3:00 M KHZ
२२ १३७५०
२५ ११७१०
सायंकालीन UTC समयानुसार शोर्ट वेव
१४:30 - 15:30 M KHZ
२५ ११९५५
२२ १३७००
रेडियो तेहरान की हिन्दी सेवा
रेडियो तेहरान की हिन्दी सेवा 25 अप्रैल 1998 को आरंभ हुई।
रेडियो तेहरान प्रतिदिन प्रात: कालीन व सांयकालीन कार्यक्रम प्रसारित करता है।प्रात: कालीन सभा आधे घंटे की भारतिय समयानुसार आठ बजे से साढ़े आठ बजे तक और सांयकालीन सभा एक घंटे की भारतीय समयानुसार आठ बजे से नौ बजे तक प्रसारित की जाती है।प्रात: कालीन सभा में साप्ताहिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त कुरआन मजीद की तिलावत समाचार और आज का इतिहास प्रसारित किया जाता है। सांयकालीन सभा में साप्ताहिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त कुरआन मजीद की तिलावत समाचार राजनीतिक चर्चा और हमारे अख़बार कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।
रेडियो तेहरान प्रतिदिन प्रात: कालीन व सांयकालीन कार्यक्रम प्रसारित करता है।प्रात: कालीन सभा आधे घंटे की भारतिय समयानुसार आठ बजे से साढ़े आठ बजे तक और सांयकालीन सभा एक घंटे की भारतीय समयानुसार आठ बजे से नौ बजे तक प्रसारित की जाती है।प्रात: कालीन सभा में साप्ताहिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त कुरआन मजीद की तिलावत समाचार और आज का इतिहास प्रसारित किया जाता है। सांयकालीन सभा में साप्ताहिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त कुरआन मजीद की तिलावत समाचार राजनीतिक चर्चा और हमारे अख़बार कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।
रेडियो रूस के श्रोता क्लबों का चौथा अखिल भारतीय सम्मेलन
रेडियो रूस के श्रोता क्लबों का चौथा अखिल भारतीय सम्मेलन पिछले साल दिल्ली स्थित रूसी विज्ञान और संस्कृति केंद्र में 15 से 16 दिसंबर तक आयोजित किया गया। इस सम्मेलन के दौरान सन् 2008 में भारत में रूस को समर्पित वर्ष और सन् 2009 में रूस में भारत को समर्पित वर्ष के परिणामों की चर्चा की गई तथा रूस और भारत के बीच सहयोग को समर्पित रेडियो रूस की प्रतियोगिता के विजेताओं के नाम घोषित किए गए। इस के अलावा रेडियो रूस द्वारा आयोजित काव्य और हास्य प्रतियोगिताओं के विजेताओं तथा सबसे सक्रिय श्रोताओं और संवाददाताओं के नाम भी घोषित किए गए। अब हम आपके सामने विजेताओं के नाम प्रस्तुत करते हैं।
वर्ष 2009 के पुरस्कार विजेताः
रूस और भारत के बीच सहयोग को समर्पित रेडियो रूस की प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताः
1) नानजी जे. जाजाणी (अरिहंत नगर, गुजरात)
2) दलीप सिंह रोकाय (नैनीताल, उत्तराशण्ड)
3) अनिल ताम्रकार (कटनी, मध्य प्रदेश)
प्रोत्साहन पुरस्कार विजेताः
1) मितुल कंसल (कुरुक्षेत्र, हरियाना)
2) पराग पुरोहित (पुणे, महाराष्ट्र)
3) रिजवान सज्जाद (फफून्द, औरैया, उत्तर प्रदेश)
विशेष पुरस्कार विजेताः
चुन्नीलाल कैवर्त (सोनपुरी, छत्तीसगढ़)
रेडियो रूस को पत्र भेजने में मदद करने के लिए पुरस्कार विजेताः
शमसुद्दीन साकी अदीबी (मुबारकपुर आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश)
काव्य प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताः
1) आर. एन. सिंह (शाहजहांपुर. उत्तर प्रदेश)
2) क़मर सुल्ताना कुरैशी (नया भोजपुर, बिहार)
3) भैयालाल प्रजापति (मरुफ़पुर, उत्तर प्रदेश)
हास्य प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताः
1) निलेश कुमार सिंह (खनिता, बक्सर, बिहार)
2) श्रीमति नुनुदेवी (बरमा, शेखपुरा, बिहार)
वर्ष 2009 के पुरस्कार विजेताः
रूस और भारत के बीच सहयोग को समर्पित रेडियो रूस की प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताः
1) नानजी जे. जाजाणी (अरिहंत नगर, गुजरात)
2) दलीप सिंह रोकाय (नैनीताल, उत्तराशण्ड)
3) अनिल ताम्रकार (कटनी, मध्य प्रदेश)
प्रोत्साहन पुरस्कार विजेताः
1) मितुल कंसल (कुरुक्षेत्र, हरियाना)
2) पराग पुरोहित (पुणे, महाराष्ट्र)
3) रिजवान सज्जाद (फफून्द, औरैया, उत्तर प्रदेश)
विशेष पुरस्कार विजेताः
चुन्नीलाल कैवर्त (सोनपुरी, छत्तीसगढ़)
रेडियो रूस को पत्र भेजने में मदद करने के लिए पुरस्कार विजेताः
शमसुद्दीन साकी अदीबी (मुबारकपुर आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश)
काव्य प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताः
1) आर. एन. सिंह (शाहजहांपुर. उत्तर प्रदेश)
2) क़मर सुल्ताना कुरैशी (नया भोजपुर, बिहार)
3) भैयालाल प्रजापति (मरुफ़पुर, उत्तर प्रदेश)
हास्य प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताः
1) निलेश कुमार सिंह (खनिता, बक्सर, बिहार)
2) श्रीमति नुनुदेवी (बरमा, शेखपुरा, बिहार)
पृथ्वी से परे सभ्यता की खोज dw
इस ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं हैं तो वे सभ्यताएं कहां हैं, जो हमारी जैसी या शायद उससे भी बेहतर हैं? उड़न तश्तरियां कहां से आती हैं? वे कल्पनाएं नहीं हैं तो उन्हें चलाने वाले हमारे रेडियो संकेतों का जवाब क्यों नहीं देते.
अमेरिका के प्रोफ़ेसर फ़्रैंक ड्रेक को भी यही प्रश्न कुरेदा करते थे. आज से पचास साल पहले, 1960 में, जब वे तीस साल के भी नहीं थे, तब उन्होंने एक रेडियो टेलिस्कोप की मदद से पहली बार पृथ्वी से परे इतरलोकीय सभ्यता की आहट लेनी चाही. सोचा, उन्हें कुछ इस तरह की आवाज़ें सुनाई पड़ेंगी. वह बताते हैं, "मेरे पहले प्रयोग का नाम था प्रॉजेकट आज़मा. हमने दो महीनों तक सूर्य जैसे दो तारों की दिशा में रेडियो संकेतों की खोज की. लेकिन हमें कुछ नहीं मिला."
कोई सुराग नहीं
फ्रैंक ड्रेक को आज तक ऐसा कुछ नहीं मिला है, जिसके बारे में भरोसे के साथ कहा जा सकता कि वह किसी Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: दूसरी दुनिया के सभ्य लोगों की पैदा की हुई रेडियो तरंग है. रेडियो तरंगें तो ढेरों मिलती हैं, लेकिन वे आकाशीय पिंडों द्वारा स्वयं पैदा की हुई प्राकृतिक तरंगें होती हैं. तब भी, फ्रैंक ड्रेक की जिज्ञासा और लगन की कोख से विज्ञान की एक नई शाखा का जन्म हुआ, जैवखगोल विज्ञान (बायोएस्ट्रॉनॉमी) का. विज्ञान की यह नई शाखा अंतरिक्ष में संभावित जीवन की खोजबीन को समर्पित है.
फ्रैंक ड्रेक सन फ्रांसिस्को के तथाकथित सेती इस्टीट्यूट के लिए काम करते हैं. SETI का अर्थ है Search for Extraterrestrial Intelligence, यानी, पृथ्वी से परे बुद्धिधारियों की खोज. आज से पैंतालीस साल पहले 8 अप्रैल 1965 के दिन सेती ने तश्तरीनुमा बड़े बड़े रेडियो एंटेनों की सहायता से अंतरिक्ष में बुद्धिधारी प्रणियों की खोज शुरू की.
भ्रम टूटा
दो ही साल बाद, 1967 में वैज्ञानिकों को लगा कि बटेर हाथ लग गयी. तब अख़बारों की सुर्खियां कुछ इस तरह की थीं. "डॉक्टरेट कर रही महिला वैज्ञानिक ने हरे आदमियों का पता लगा लिया." "हम अंतरिक्ष में अकेले नहीं हैं." "खगोलविदों ने नई दुनिया खोज निकाली."
उस महिला वैज्ञानिक का नाम था जोसेलिन बेल. लेकिन, सारी ख़ुशी पर तब पानी फिर गया, जब पता चला कि जिस रेडियो पल्स (स्पंद) को किसी सभ्यता का संकेत समझा जा रहा था, वह वास्तव में एक मृत न्यूट्रॉन तारे से आ रहा था. न्यूट्रॉन तारे ऐसे ठोस पिंड होते हैं, जो बहुत तेज़ी से घूमते हैं और साथ ही बहुत ही कसी हुई रेडियो तरंगों की कौंध सी पैदा करते हैं. इसीलिए उन्हें पल्सर भी कहा जाता है.
अमेरिका के प्रोफ़ेसर फ़्रैंक ड्रेक को भी यही प्रश्न कुरेदा करते थे. आज से पचास साल पहले, 1960 में, जब वे तीस साल के भी नहीं थे, तब उन्होंने एक रेडियो टेलिस्कोप की मदद से पहली बार पृथ्वी से परे इतरलोकीय सभ्यता की आहट लेनी चाही. सोचा, उन्हें कुछ इस तरह की आवाज़ें सुनाई पड़ेंगी. वह बताते हैं, "मेरे पहले प्रयोग का नाम था प्रॉजेकट आज़मा. हमने दो महीनों तक सूर्य जैसे दो तारों की दिशा में रेडियो संकेतों की खोज की. लेकिन हमें कुछ नहीं मिला."
कोई सुराग नहीं
फ्रैंक ड्रेक को आज तक ऐसा कुछ नहीं मिला है, जिसके बारे में भरोसे के साथ कहा जा सकता कि वह किसी Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: दूसरी दुनिया के सभ्य लोगों की पैदा की हुई रेडियो तरंग है. रेडियो तरंगें तो ढेरों मिलती हैं, लेकिन वे आकाशीय पिंडों द्वारा स्वयं पैदा की हुई प्राकृतिक तरंगें होती हैं. तब भी, फ्रैंक ड्रेक की जिज्ञासा और लगन की कोख से विज्ञान की एक नई शाखा का जन्म हुआ, जैवखगोल विज्ञान (बायोएस्ट्रॉनॉमी) का. विज्ञान की यह नई शाखा अंतरिक्ष में संभावित जीवन की खोजबीन को समर्पित है.
फ्रैंक ड्रेक सन फ्रांसिस्को के तथाकथित सेती इस्टीट्यूट के लिए काम करते हैं. SETI का अर्थ है Search for Extraterrestrial Intelligence, यानी, पृथ्वी से परे बुद्धिधारियों की खोज. आज से पैंतालीस साल पहले 8 अप्रैल 1965 के दिन सेती ने तश्तरीनुमा बड़े बड़े रेडियो एंटेनों की सहायता से अंतरिक्ष में बुद्धिधारी प्रणियों की खोज शुरू की.
भ्रम टूटा
दो ही साल बाद, 1967 में वैज्ञानिकों को लगा कि बटेर हाथ लग गयी. तब अख़बारों की सुर्खियां कुछ इस तरह की थीं. "डॉक्टरेट कर रही महिला वैज्ञानिक ने हरे आदमियों का पता लगा लिया." "हम अंतरिक्ष में अकेले नहीं हैं." "खगोलविदों ने नई दुनिया खोज निकाली."
उस महिला वैज्ञानिक का नाम था जोसेलिन बेल. लेकिन, सारी ख़ुशी पर तब पानी फिर गया, जब पता चला कि जिस रेडियो पल्स (स्पंद) को किसी सभ्यता का संकेत समझा जा रहा था, वह वास्तव में एक मृत न्यूट्रॉन तारे से आ रहा था. न्यूट्रॉन तारे ऐसे ठोस पिंड होते हैं, जो बहुत तेज़ी से घूमते हैं और साथ ही बहुत ही कसी हुई रेडियो तरंगों की कौंध सी पैदा करते हैं. इसीलिए उन्हें पल्सर भी कहा जाता है.
मई की पहेली Deutsche Welle
आइसलैंड में ज्वालामुखी में विस्फोट के बाद कई दिनों तक उड़ानें ठप रही. हवा में चक्का जाम होने के कई दिनों बाद सबसे पहले फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट से भरी गई उड़ानें. आपको बताना है कि किस देश में है फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट.
ए. फ़्रांस
बी. जर्मनी
सी. डेनमार्क
आप अपने जवाब 31 मई तक डाक, ईमेल या एसएमएस से भेज दें. विजेताओं के नाम उचित समय पर "आपकी बारी आपकी बात" कार्यक्रम में बताए जाएंगे और वेबसाइट पर भी जारी होंगे. सभी विजेताओं को पत्र से सूचना भी भेजी जाएगी. आप अपना नाम और पता साफ़ साफ़ अक्षरों में लिखें.
हमारा पता जर्मनी में-
Deutsche Welle
Hindi Service
53110 Bonn /
GERMANY
Tel.No. 0049 228 429-4760
Fax No.0049 228 429-4720
भारत में-
Deutsche Welle
Hindi Service
Post Box No. 5211
Chanakyapuri,
New Delhi – 110021 / INDIA
ई-मेल का पताः hindi@dw-world.de
एसएमएस का नंबरः +91 9967354007
वॉयसमेल का नंबरः 0049 228 429 16 4176
ए. फ़्रांस
बी. जर्मनी
सी. डेनमार्क
आप अपने जवाब 31 मई तक डाक, ईमेल या एसएमएस से भेज दें. विजेताओं के नाम उचित समय पर "आपकी बारी आपकी बात" कार्यक्रम में बताए जाएंगे और वेबसाइट पर भी जारी होंगे. सभी विजेताओं को पत्र से सूचना भी भेजी जाएगी. आप अपना नाम और पता साफ़ साफ़ अक्षरों में लिखें.
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Tel.No. 0049 228 429-4760
Fax No.0049 228 429-4720
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वॉयसमेल का नंबरः 0049 228 429 16 4176
रेडियो जापान ने जापानी भाषा
रेडियो जापान ने जापानी भाषा सिखाने के लिए“सवालों में सतरंगी जापानी”कार्यक्रम की नई वैबसाइट शुरू की है।
आप हमारे प्रश्नों के उत्तर देकर बोलचाल की जापानी के कुछ ज़रूरी बोलों का अभ्यास कर सकते हैं। अगर आपका उत्तर सही होगा तो स्क्रीन पर कुछ उभरेगा। अब देर कैसी? आप भी अपना जापानी भाषा ज्ञान परखें!
आप हमारे प्रश्नों के उत्तर देकर बोलचाल की जापानी के कुछ ज़रूरी बोलों का अभ्यास कर सकते हैं। अगर आपका उत्तर सही होगा तो स्क्रीन पर कुछ उभरेगा। अब देर कैसी? आप भी अपना जापानी भाषा ज्ञान परखें!
कंप्यूटर प्रिंटर से स्वास्थ्य ख़तरे में
फ़ोटोकॉपी मशीनयदी आप के पास कंप्यूटर है, तो उस के साथ जुड़ा एक प्रिंटर भी ज़रूर होगा. प्रिंटर यदि एक लेज़र प्रिंटर है, जिस में स्याही की जगह महीन पाउडर वाला एक कार्ट्रिज लगता है, तो सावधान हो जाइये! आपका स्वास्थ्य ख़तरे में है.
कंप्यूटर प्रिंटर के कार्ट्रिज वाले पाउडर को टोनर कहते हैं. टोनर के कण इतने महीन होते हैं कि कार्ट्रिज से बाहर वे बड़ी देर तक हवा में तैर सकते हैं और सांस के रास्ते से हमारे फेफड़ों में पहुंच कर हमें बीमार कर सकते हैं.
जर्मनी में फ्राइबुर्ग विश्वविद्यालय के पर्यावरण चिकित्सा और अस्पताल स्वच्छता संस्थान की एक शोध टीम ने इसी को अपनी खोज का विषय बनाया. वह जानना चाहती थी कि टोनर से उड़ने वाले अत्यंत महीन कण जब हमारे फेफड़ों में पहुंचते हैं, तो उनका क्या असर होता है? उन्होंने टोनर की धूल का फेफड़े की कोषिकाओं के कल्चर यानी संवर्ध से संपर्क कराया. परिणाम उनके लिए बहुत ही आश्चर्यजनक रहा, जैसा कि संस्थान के निदेशक प्रो. फ़ोल्करमेर्स सुंदरमान का कहना है, "फेफड़े की इन कोषिकाओं को टोनर की धूल के संपर्क में लाने पर उनके जीनों को बड़ा नुकसान पहुंचा. यह नुकसान इतना व्यापक और गहरा पाया गया कि हमें कहना पड़ेगा कि उससे कोषिकाओं के जीनों में म्यूटेशन पैदा होता है."
कंप्यूटर प्रिंटर के कार्ट्रिज वाले पाउडर को टोनर कहते हैं. टोनर के कण इतने महीन होते हैं कि कार्ट्रिज से बाहर वे बड़ी देर तक हवा में तैर सकते हैं और सांस के रास्ते से हमारे फेफड़ों में पहुंच कर हमें बीमार कर सकते हैं.
जर्मनी में फ्राइबुर्ग विश्वविद्यालय के पर्यावरण चिकित्सा और अस्पताल स्वच्छता संस्थान की एक शोध टीम ने इसी को अपनी खोज का विषय बनाया. वह जानना चाहती थी कि टोनर से उड़ने वाले अत्यंत महीन कण जब हमारे फेफड़ों में पहुंचते हैं, तो उनका क्या असर होता है? उन्होंने टोनर की धूल का फेफड़े की कोषिकाओं के कल्चर यानी संवर्ध से संपर्क कराया. परिणाम उनके लिए बहुत ही आश्चर्यजनक रहा, जैसा कि संस्थान के निदेशक प्रो. फ़ोल्करमेर्स सुंदरमान का कहना है, "फेफड़े की इन कोषिकाओं को टोनर की धूल के संपर्क में लाने पर उनके जीनों को बड़ा नुकसान पहुंचा. यह नुकसान इतना व्यापक और गहरा पाया गया कि हमें कहना पड़ेगा कि उससे कोषिकाओं के जीनों में म्यूटेशन पैदा होता है."
Sunday, 4 April 2010
२२ अप्रैल पृथ्वी दिन
२२ अप्रैल को पुरे विश्व में पृथ्वी दिन मनाया जाएगा | हमें अपनी पृथ्वी को बचाने के लिए अपने बल पर कुछ वास्तविक काम करना होगा | आओ हम सब अपने स्थान पर पृथ्वी को बचाने के लिए पेड़ पौधे लगाएं , प्रदुषण को फैलाते कारखानों - वाहनों सें बचाएं | स्कूलों में बच्चों को जागृत करें |
કેસુડો
કચ્છ ના મધ્ય પર્વતીય વિસ્તારો માં ફાગણ મહિના માં કેસુડા નાં ફુલ ખીલેલા જોવા મળે ચે. ઍનો રંગ ઍટલો બધો પ્રભાવી લાગે કે વગડા માં જાણે આગ લાગી હાય.
रेडियो जापान की ७५ वीं जयंती पर प्रतियोगिता
रेडियो जापान की ७५ वीं जयंती पर एक प्रतियोगिता का आयोजन किया है | जिसमें एक प्रश्न का उत्तर भेजना है | पुरे विश्व में सें ज्यादा योग्य जवाब भेजने वाले तीन भाग्यशाली को इस वर्ष जापान जाने का अवसर मिलेगा |
प्रश्न : रेडियो जापान का आपके लिए क्या महत्व है ?
इस विषय पर फोटो , रेखाचित्र पर अपने विचार भेजने हैं |
अन्तिम तारीख : १० मई २०१०
http://www.nhk.or.jp/nhkworld/hindib
प्रश्न : रेडियो जापान का आपके लिए क्या महत्व है ?
इस विषय पर फोटो , रेखाचित्र पर अपने विचार भेजने हैं |
अन्तिम तारीख : १० मई २०१०
http://www.nhk.or.jp/nhkworld/hindib
रेडियो जापान अब नई फ्रिक्वंसी ४९ मी. पर
रेडियो जापान का हिंदी प्रसारण अब २८ मार्च सें
नई फ्रीक्वेंसी 49 मीटर बैंड में 5975 किलोहर्टज़ पर हो रहा है |
नई फ्रीक्वेंसी 49 मीटर बैंड में 5975 किलोहर्टज़ पर हो रहा है |
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